गणगौर व्रत 15 अप्रैल : पति से छिपकर की जाती है गणगौर का व्रत, पढ़ें इससे जुड़ी कथा

चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को सुहागिन महिलाएं गणगौर तीज का व्रत रखती हैं। इस साल गणगौर व्रत 15 अप्रैल, गुरुवार के दिन आ रहा है। गणगौर तीज माता पार्वती से जुड़ा हुआ त्योहार है। इस दिन महिलाएं माता पार्वती व भगवान शंकर की पूजा करती हैं। माना जाता है कि इनकी पूजा करने से सौभाग्यवती रहने का वरदान प्राप्त होता है और परिवार में खुशियां बनीं रहती हैं। गणगौर तीज का व्रत मुख्य रूप में मध्य प्रदेश और राजस्थान में मनाया जाता है।

गणगौर तीज शुभ मुहूर्त 

चैत्र शुक्ल पक्ष तृतीया तिथि आरंभ 14 अप्रैल दोपहर 12 बजकर 47 मिनट से होगा। जबकि चैत्र शुक्ल पक्ष तृतीया तिथि समाप्ति 15 अप्रैल शाम 03 बजकर 27 मिनट को होगी। गणगौर पूजा शुभ मुहूर्त 15 अप्रैल को सुबह 05 बजकर 17 मिनट से 06 बजकर 52 मिनट तक। यानी आप इस दौरान ही पूजा करें। हालांकि ये व्रत महिलाए पति से छुपाकर गुप्त रूप से करती हैं और इसे एक कथा जुड़ी हुई है जो कि इस प्रकार है।

गणगौर की कथा –

इस व्रत से जुड़ी कथा के अनुसार एक बार भगवान शंकर पार्वती और नारद जी के साथ भ्रमण के लिए निकले। वे चलते-चलते चैत्र शुक्ल तृतीया के दिन एक गांव में पहुंच गए। उन्हें देखकर गांव की निर्धन स्त्रियां ने उनका स्वागत करने का सोचा। गांव की महिलाएं स्वागत के लिए थालियों में हल्दी अक्षत लेकर पहुंच गई। ये भावना देखते हुए पार्वती जी ने इनपर सुहाग रस छिड़क दिया और इन्हें सौभाग्यवती रहने का वरदान दिया। ये बात पता चलने के बाद धनी वर्ग की स्त्रियां अनेक प्रकार के पकवान सोने-चांदी के थाल में सजाकर पहुंची।

इन महिलाओं को देखकर भगवान शंकर ने पार्वती से कहा तुमने सारा सुहाग रस तो निर्धन वर्ग की स्त्रियां को दे दिया है। अब इन्हें क्या दोगी? पार्वती बोली- प्राणनाथ! उन महिलाओं को ऊपरी पदार्थो से बना रस दिया गया है। परंतु मैं इन धनी वर्ग की स्त्रियों को अपनी अंगुली चीरकर रक्त का सुहाग दूंगी जो मेरे समान सौभाग्यवती हो जाएंगी। जब इन स्त्रियों ने पूजन समाप्त कर लिया तब पार्वती जी ने अपनी अंगुली चीरकर उस रक्त को उनके ऊपर छिड़क दिया। जिस पर जैसे छींटे पड़े उसने वैसा ही सुहाग पा लिया।

इसके बाद मां पार्वती के मन में भोलेनाथ की पूजा करने का विचार आया और वो स्नान का बहाना बनाकर एक नदी के पास चले गई। यहां इन्होंने बालू से शिवलिंग बनाया और उसकी पूजा की। बालू से ही प्रसाद बनाकर उसे ग्रहण भी किया। उसके बाद ये वापस लौट गई। देरी से आने पर शिव जी ने इनसे पूछा की आप कहां थी? आपको भूख लगी होगी। इसपर पार्वती मां ने कहा कि उन्हें रास्ते में अपने मायके के लोग मिल गए और उन्होंने खाने में चावल और दूध दिया। शिवजी ने ये बात सुनकर कहा कि ठीक है। मेरे को भी वहां ले चलो। मेरा मन भी भात दूध खाने का कर रहा। ये बात सुन मां पार्वती चिंता में आ गई कि अब वो क्या करें। अगर नदी किनारे शिव जी गए तो उन्हें पता चल जाएगा की मैंने इनके लिए व्रत रखा है और पूजा की है।

तब मां ने मन ही मन में कहा कि मेरी लाज रख लो। ये कहकर मां, शिवजी और नारद जी के साथ नदी किनारे चले गई। वहां जाकर इन्होंने देखा की एक भव्य महल है। यहां पर अच्छे से इनका स्वागत किया गया और इन्हें खाने को भात व दूध दिया गया। इन्हें खाकर ये वापस लौट आए। हालांकि रास्ते में शिव जी को याद आया की वो अपनी माला महल में भूल गए हैं। तब शिव जी ने नारद से कहा कि वो महल जाकर उनकी माला ले आएं। शिव जी का आदेश पाते हुए नारद उसी जगह पर गए। लेकिन वहां पर उन्हें महल नहीं मिला। ये देखकर वो हैरान रहे गए। उन्होंने आसपास देखा तो शिव जी की माला मिल गई। जिसे लेकर ये वापस आ गए।

वापस आने के बाद इन्होंने माला देते हुए शिव जी से कहा कि वहां पर महल नहीं था ऐसा कैसे हुआ। तब शिव ने कहा कि ये सब पार्वती की माया है। वो मेरे को बताए बिना व्रत करने गई थी। ये बात पता चलने के बाद नारद जी ने मां पार्वती के पैरों को छुआ ओर कहा कि आपने ये सब क्यों किया। मां पार्वती ने कहा कि गुप्त रूप से की गई पूजा सदा सफल रहती है। इसलिए जो भी महिलाएं गुप्त रूप से ये पूजा करेंगे, उनकी पति का आयु लंबी हो जाएगी।

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