अनोखी बारात: हथोड़ा बनता है दूल्हा, धूमधाम से निकलती है बारात, नाच-गाना ढोल नगाड़ा सबकुछ होता है

भारत में जब किसी की बारात निकलती है तो उसमें भव्यता और धूम धड़ाका जरूर होता है। आपने भी अपने जीवनकाल में कई बारतें देखी होंगी। लेकिन आज हम आपको एक ऐसी अनोखी बारात के बारे में बताने जा रहे हैं जिसमें दूल्हा कोई लड़का नहीं बल्कि एक हथोड़ा है।

दरअसल हथोड़े की यह अनोखी बारात धर्मनगरी प्रयागराज में निकाली जाती है। यह एक पुरानी परंपरा है जिसे होलिका दहन के पहले हर साल किया जाता है। इस परंपरा के अनुसार होलिका दहन करने के पूर्व शहर की सड़कों पर पूरी विधि विधान के साथ मेट्रोड़े की बारात निकाली जाती है।

इस अनोखी बारात में हथोड़े को बकायदा दूल्हे की तरह शादी हो जाती है। इसके लिए एक भारी भरकम हथौड़ा चूना जाता है। यह बारात निकलने से पहले कद्दू भजन भी होता है। बताते चले कि हथोड़े की बारात निकालने की यह परंपरा कई सदियों से चली आ रही है।

हर साल होलीका दहन के पहले बीच सड़क पर हजारों लोगों की मौजूदगी में हथौड़े और कद्दू का मिलन कराया जाता है। इस परंपरा का उद्देश्य समाज मे फैली कुरीतियों को समाप्त करना है। कुछ लोग ये भी बोलते हैं कि यह हथोड़ा ही कोरोना का अंत करेगा।

हथोड़े की यह बारात एक दूल्हे की बारात की तरह पूरे ढोल नगाड़ों के साथ गलियों से होकर गुजरती है। इस बारात में सैकड़ों की संख्या में लोग हिस्सा लेते हैं। इतना ही नहीं बारात में डांस भी होता है। कुल मिलाकर हथोड़े की यह बारात उतनी ही भव्य होती है जितनी एक इंसानी दूल्हे की होती है। इस परंपरा के खत्म होते ही संगम नगरी प्रयागराज में रंगों का पवन पर्व होली शुरू हो जाता है।

हथोड़े की इस बारात के पीछे एक धार्मिक मान्यता भी प्रचलित है। इसके बारे में हथौड़ा बारात के आयोजक संजय सिंह विस्तार से बताते हैं। वे कहते हैं कि उत्पत्ति प्रयागराज में ही हुई है। भविष्यत्तर पुराण के 126वें श्लोक में इसका वर्णन पढ़ने को मिल जाता है।

प्रलय काल के पश्चात भगवान विष्णु प्रयागराज में अक्षय वट की छाया के नीचे बैठे थे। उनके द्वारा संसार को फिर से रचने हेतु भगवान विश्वकर्मा से आह्वान किया गया। हालांकि तब भगवान विश्वकर्मा समझ नहीं आए कि क्या होना चाहिए। ऐसे में भगवान विष्णु ने वहीं पर तपस्या, हवन और यज्ञ करना शुरू कर दिया। इससे परेशान होने की उत्पत्ति हुई। बस तभी से संगम नगरी प्रयागराज को यह हथौड़ा बेहद प्रिय है।

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